अपराधिक मामलों की सुनवाई वाली अदालतें

अपराधिक मामलों की सुनवाई करने वाली अदालतें

Criminal offences
Criminal offences 

 प्राथमिक  स्तर पर मजिस्ट्रेट जैसे कि मुख्य ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ,ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी या मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत आपराधिक मामलों की सुनवाई करती है|

         आपराधिक मामलों को स्वीकार करने के बाद यह अदालतें अपराध की किस्म के अनुरूप उन पर सुनवाई की कार्यवाही को आगे बढ़ाती है |
1. तथ्यों की शिकायत पर
2. पुलिस रिपोर्ट पर
3. पुलिस अधिकारी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्राप्त सूचना पर अथवा किस तरह प्राप्त किया गया है उस पर अपने ज्ञान के अनुसार निर्णय लेकर |

सत्र न्यायालय यानी सेशन जज की अदालत

भारतीय कानून व्यवस्था के अनुसार कुछ आपराधिक मुकदमों की सुनवाई केवल सत्र न्यायालयों में होती है| सत्र न्यायालय का पीठासीन अधिकारी सत्र न्यायाधीश या अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश होता है |संगीन अपराध की सुनवाई के अधिकार मजिस्ट्रेट की अदालत को नहीं है, इसलिए जब भी ऐसे आपराधिक मामले मजिस्ट्रेट के सम्मुख पेश किए जाते हैं तो वह उन्हें सुनवाई के लिए संबंधित पत्र न्यायाधीश की अदालत में भेज देता है, उदाहरण के तौर पर हत्या के मामले यह हत्या के प्रयास के मामले में सुनवाई के व सत्र न्यायाधीश की अदालत में होती है|  ऐसे मामलों को सत्र न्यायालयों में भेजने से  पहले स्तर की कार्यवाही मजिस्ट्रेट की अदालत द्वारा की जाती है, इस स्तर की कार्यवाही में अभियुक्त की उपस्थिति तथा उसे चलाना अन्य दस्तावेजों की कॉपियां निशुल्क उपलब्ध करवाना शामिल है|   न्यायालय में मामला भेजने से पहले अभियुक्त को बकायदा सूचित किया जाता है, कि सत्र न्यायालय में किस तारीख को होगी न्यायाधीश अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के न्यायालय में भी भेज सकता है | या उसे अपने न्यायालय में भी चला सकता ह।

      उदाहरण के तौर पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आपराधिक मामलों की सुनवाई करने वाली अदालत ने निम्नलिखित न्यायालय परिसर में स्थित है:-
1. तीस हजारी न्यायालय परिसर |
2. कड़कड़डूमा न्यायालय परिसर |
3. पटियाला हाउस न्यायालय परिसर |
4. रोहिणी न्यायालय परिसर |
5. द्वारिका न्यायालय परिसर |
6. साकेत न्यायालय परिसर |

                                विशेष अदालतें

कुछ मुकदमों की सुनवाई केवल कुछ विशेष न्यायालयों में होती है जिन्हें किसी विशेष कानून के अंतर्गत गठित किया जाता है|

किशोर न्याय बोर्ड 18 वर्ष से कम उम्र वालों के लिए न्यायालय

इसे जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के नाम से भी जाना जाता है |किशोरों के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालय का गठन किया गया है |जो उनके खिलाफ दर्ज मुकदमों की सुनवाई करता है, कानून के मुताबिक कोई भी बालक या वयस्क जिसकी आयु 18 वर्ष से कम है वह किशोर की श्रेणी में आता है, अपराध के होने के समय यदि जुर्म करने वालों की आयु 18 वर्ष से कम है तो उसका मुकदमा सुनवाई के लिए किशोर न्याय बोर्ड को भेजा जाता है| ऐसे मुकदमों की सुनवाई करने वाले किशोर न्याय बोर्ड में प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट 2 सदस्य होते हैं|
               जब भी पुलिस किसी किशोर पर किसी अपराध का दोष लगाती है और चालान साधारण न्यायालय के समक्ष पेश करती है ,तो मुकदमे से संबंधित कोई भी पक्ष पीठासीन न्यायिक अधिकारी मजिस्ट्रेट को यह जानकारी दे सकता है , कि अपराध के समय जुर्म करने वाले की आयु 18 वर्ष से कम थी और उसका मुकदमा आगे की कार्यवाही के लिए किशोर न्याय बोर्ड में भेजा जाना चाहिए|

      लोक अदालते

लोक अदालतों का आयोजन समय-समय पर किया जाता है ,यह आयोजन पहले से तय तारीख पर होता है जिसकी सूचना आम जनता तथा संबंधित अधिकारियों को पहले से दे दी जाती है |लोक अदालतों के आयोजन का उद्देश्य न्यायालय में विचाराधीन मुकदमों का तुरंत समाधान करना है ताकि न्यायालय पर बढ़ता मुकदमों का बोझ कम हो सके| इसके अलावा लोक अदालतों में ऐसे मामलों की सुनवाई भी होती है जो मुकदमे की अवस्था तक पहुंच ही नहीं है कोई भी पक्ष के मामलों के शांतिपूर्ण हल के लिए लोक अदालत में आवेदन कर सकता है |या इसके लिए पहले न्यायालय में मुकदमा दाखिल करना जरूरी नहीं है यदि कोई मामला न्यायालय में विचाराधीन है तथा उस से जुड़ा कोई भी पक्ष लोक अदालत में सुनवाई के लिए आवेदन करता है तो संबंधित न्यायाधीश मामले को अदालत में भेज देता है, इसके अतिरिक्त न्यायाधीशों को भी लोग अदालत में भेज सकता है जिससे न्यायिक कार्यवाही के बिना शांतिपूर्ण हल की संभावना होती है|
यहां यह बताना भी जरूरी है कि लोक अदालतों के निर्णय  तथा हल को स्वीकार करना जरूरी नहीं है ,मामलों से जुड़ा कोई भी पक्ष अपनी इच्छा अनुसार लोक अदालत में सुनवाई के लिए आवेदन कर सकता है |जैसे कि दिल्ली में यह आवेदन दिल्ली विधिक सेवा प्राधिकरण में दाखिल किया जाता है राजधानी दिल्ली के विभिन्न न्यायालयों में समय-समय पर लोक अदालतों का आयोजन किया जाता है |

   लोक अदालत की कार्यवाही के दौरान वादी और प्रतिवादी वह व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर प्रदान करके विचार-विमर्श सलाह विनती के द्वारा तथा अनौपचारिक वातावरण में सुलह समझौता करने का अवसर देकर विवाद के हल का प्रयास किया जाता है |इसके अतिरिक्त स्थाई लोक अदालत  भी होती है दिल्ली में स्थापित ऐसी स्थाई लोक अदालतों के पीठासीन अधिकारी दिल्ली उच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायिक सेवा के सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं | फिलहाल इन लोक अदालतों में दिल्ली उच्च न्यायालय में विचाराधीन मुकदमों से दिल्ली विकास प्राधिकरण ,दिल्ली नगर निगम, नई दिल्ली नगरपालिका, महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड, तथा बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनियों इत्यादि के नए मामलों की सुनवाई होती है |

 महिला अदालतें

महिलाओं से संबंधित आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए महिला अदालतों का गठन किया है इन अदालतों में संबंध विच्छेद के बाद पत्नी बच्चों और अभिभावकों को (सीआर.पीसी  की धारा -125 के तहत) दिए जाने वाले भरण-पोषण भत्ते महिलाओं के साथ हुए अत्याचार((आईपीसी की धारा- 498- ए) ,स्त्रीधन की वस्तुएं का दुरुपयोग आईपीसी की धारा -406) शीलभंग करना (आईपीसी की धारा -363 )तथा महिलाओं को डराने और धमकाने (आईपीसी की धारा -506) मामलों की सुनवाई की जाती है |

पारिवारिक न्यायालय

राज्यों में पारिवारिक न्यायालय का भी गठन किया गया है दिल्ली में द्वारका, साकेत, रोहिणी में ऐसे न्यायालयों की स्थापना की गई है |

दिल्ली जिला न्यायालय की वेबसाइट

Www.delhidistrictcourts.nic.in

जिला न्यायालय दिल्ली की हिंदी वेबसाइट

                                   

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