आपराधिक शिकायत कौन दर्ज करवा सकता है?

कोई भी व्यक्ति संबंधित मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश के न्यायालय में अपराध की पुष्टि करने वाले तथ्यों की शिकायत दर्ज करवाकर दंड प्रक्रिया को शुरू कर सकता है |उदाहरण के तौर पर, चेक बाउंस होने वाले केस को लिखित अधिनियम (इंस्ट्रूमेंट एक्ट) की धारा-धारा-
 142 के तहत जिस के हक में चेक जारी किया गया, वह व्यक्ति शिकायत कर सकता है |
     शिकायतकर्ता व्यक्तिगत तौर पर न्यायालय के समक्ष हाजिर होने में सक्षम होना चाहिए जहां शिकायत किसी कंपनी या कारपोरेट या सोसाइटी के नाम पर की जाती है , वहां यह जरूरी हो जाता है कि उस कंपनी या कॉरपोरेट का कोई कर्मचारी अधिकारी न्यायालय में कंपनी की तरफ से हाजिर हो |


      जहां तक एकल स्वामित्व( सोल प्रोपराइटरशिप )का संबंध है जैसे कि केवल एक ही व्यक्ति कोई कारोबार करता है तो शिकायत केवल प्रोपराइटर के विरुद्ध दर्ज करवाई जा सकती है | कंपनी के मामले में उस कंपनी से संबंधित कोई भी व्यक्ति चाहे व उसका डायरेक्टर हो या मैनेजर या कंपनी द्वारा अधिकार प्राप्त कोई अन्य व्यक्ति न्यायालय की प्रक्रिया में कंपनी की तरफ से शिकायत कर सकता है | न्यायालय इस बात का पूरा ध्यान रखता है कि कंपनी के अधिकारी द्वारा शिकायत दर्ज करवाई गई शिकायत दर्ज करवाने का अधिकार प्राप्त है या नहीं यदि कंपनी का कोई मैनेजर की शिकायत दर्ज करवाता है उसे कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स सरकार ने सुनवाई के दौरान किसी प्रतिनिधि को सुधार कर सकती है
Offences
Offense 

किन मामलों में शिकायत दाखिल करने से पहले अनुमति की आवश्यकता होती है? 

सीआरपीसी की धारा 197 के तहत शिकायत दाखिल करने के लिए सरकारी स्वीकृति प्रदान करने का प्रावधान है अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए जब कोई जनसेवा क्या सरकारी कर्मचारी कोई गैर कानूनी कार्य प्राप्त करता है और उसे अभी मुक्त बनाया जाता है तो ऐसी स्थिति में शिकायत दाखिल करने से पहले इसकी पूर्व अनुमति ली जाती है जहां यह जानकारी देना भी आवश्यक है कि कुछ आपराधिक मामलों में किसी सक्षम व्यक्ति अधिकारी है जनसेवक की शिकायत मात्र ही कानूनी कार्यवाही शुरू हो जाती है या तब जब सरकार यह संबंधित प्राधिकरण इसकी मंजूरी दे देता है वास्तव में या न्यायालय को सरकार की मंजूरी लिए बिना उसके अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही करने से वंचित करता है।


उदाहरण के तौर पर केंद्र के सैन्य बल के किसी सदस्य सैनिक द्वारा अपने अधिकारी कर्तव्यों का पालन करते हुए यदि कोई अपराध किया जाता है | जैसे मामलों में कोई भी व्यक्ति कार्यवाही करने से पहले न्यायालय केंद्र सरकार से इसकी मंजूरी लेता है ,वैवाहिक मामलों से जुड़े अपराधों मैं पीड़ित व्यक्ति या पीड़िता की किसी भी संबंधी की शिकायत पर मुकदमे की कार्यवाही शुरू हो सकती है |ऐसे मामलों में सी.आर.पी.सी की धारा- 198 में दिए गए प्रावधानों का हवाला दिया जा सकता है| सी.आर.पी.सी की धारा -125 के तहत किसी जनसेवक की अवमानना करने लोक न्याय के विरुद्ध किए गए अपराध का गवाही के तौर पर जमा किए गए दस्तावेजों के संबंध में किए गए अपराधों के लिए मुकदमा चलाने के प्रावधानों का उल्लेख मिलता है |


आपराधिक शिकायत कहां दर्ज करें? 

सामान्यतः किसी अपराध की जांच में मुकदमा उसे अदालत में चलता है जिसके अधिकारिता क्षेत्र में वह अपराध हुआ है परंतु इस सामान्य नियम के अपवाद सीआरपीसी की धारा -178 रथा 188 भी है उदाहरण के तौर पर कोई व्यक्ति यदि पहली पत्नी के रहते हुए दूसरी शादी करता है तो उसके मामले की जांच में मुकदमा उच्च न्यायालय में चलाया जा सकता है| जिसके अधिकार एकता क्षेत्र में अपराध हुआ है या उच्च न्यायालय में जहां वह अपनी पहली पत्नी के साथ अंतिम समय रहा था उच्च न्यायालय में भी जहां अपराध होने के बाद से उसकी पहली पत्नी अस्थाई तौर पर रह रही है, एक और उदाहरण लेते हैं यदि आप सफर पर है और आपके साथ कोई अपराध हो जाता है, तो उसकी जांच या मुकदमा अदालत में चलाया जा सकता जिसके आधारित चित्र में सफर के दौरान हुआ है या वहां से आप सफर करते हैं उसका  समान गुजरा |


 इसलिए शिकायत करते समय अपनी याचिका में इस बात का स्पष्ट उल्लेख अवश्य करें कि किस आधार पर मामला उच्च न्यायालय में दाखिल किया गया है |कुछ अपराधिक मामलों की सुनवाई का अधिकार केवल सत्र न्यायालय को प्राप्त होता है | जिसके पीठासीन अधिकारी सेशन जज या अतिरिक्त सेशन जज होता है| उस मुकदमे मजिस्ट्रेट के न्यायालय द्वारा सत्र न्यायालय में सुनवाई के लिए भेजे जाते हैं, इसके अतिरिक्त विशेष अधिनियम के अंतर्गत आने वाले कुछ मामला न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं | न्यायालय न्यायालय मुख्य महानगर दंडाधिकारी के अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत की जाती है दूसरे राज्य में शिकायत होने के पश्चात संबंधित जुडिशल मजिस्ट्रेट के पास सुनवाई के लिए भेजी जाती है, इसके अलावा किसी भी न्यायालय को किसी खास तरह के मामलों की शिकायत की सुनवाई के लिए निर्देश दिया जाता है  |ऐसे मामले न्यायालय में दाखिल किए जा सकते हैं जिसको सुनवाई करने का निर्देश होता है राजधानी दिल्ली में फिलहाल 6 न्यायालय परिसर है |


      राजधानी दिल्ली में फिलहाल छह न्यायालय परिसर है:-
1. तीस हजारी न्यायालय परिसर |
2. कड़कड़डूमा न्यायालय परिसर|
3. पटियाला हाउस न्यायालय परिसर|
4. रोहिणी न्यायालय परिसर|
5. द्वारिका न्यायालय परिसर|
6. साकेत न्यायालय परिसर|

     आपराधिक शिकायत कब दाखिल कर सकते हैं? 

किसी अपराध के शिकायत हमेशा लिखित रूप में दाखिल की जाती है अवकाश के दिनों को छोड़कर आप कभी भी न्यायालय के कार्य समय के दौरान अपनी शिकायत दाखिल कर सकते हैं |न्यायालय का समय प्रातः 10:00 से सायं 4:00 बजे तक होता है, किसी किसी राज्य के किसी किसी जिला में अदालत प्रातः 7:00 बजे से भी कामकाज शुरू करता है गुजरात में शाम की अदालतें भी लगाई जा रही है, आमतौर पर महीने के दूसरे शनिवार अवकाश के दिनों में न्यायालय बंद होते हैं| इसके अलावा प्रतिदिन 1:30 से 2:00 या कहीं कहीं 1:00 से 1:30 बजे तक मध्यांतर अवकाश होता है |कई न्यायालय परिसर में फाइलिंग काउंटर बनाए गए कहीं कहीं बनाए जा रहे हैं| दिल्ली में आप 10:00 बजे से 1:30 बजे तक और इसके बाद 2:00 बजे से 2:30 बजे तक नए मामलों को फाइलिंग काउंटर में दाखिल कर सकते |अवकाश के दिनों को न्यायालय में शिकायत दर्ज करवाने के निर्धारित समय सीमा से बाहर रखा गया है|


          इस समय- सीमा का आरंभ कब से शुरू होता है? 

आमतौर पर समय सीमा के अपने अपराधी द्वारा प्राप्त किए जाने के तारीख से शुरू हो जाती है |कोई मामला ऐसा भी हो सकता है जिसमें आपको अपराधी द्वारा प्राप्त किए जाने की जानकारी ही नहीं है |यहां तक कि पुलिस को भी अपराध के बारे में कोई सूचना नहीं है| ऐसे मामलों में समय सीमा की शुरुआत उस दिन से आरंभ होती है| जब आपको या पुलिस की किसी अधिकारी को जो भी पहले हो उस अपराध के होने का पता चलता है, कई बार आपको अपराध होने की जानकारी तो होती है| परंतु आप या नहीं जानते कि अपराधी कौन है यहां तक कि पुलिस भी अपराधी का पता लगाने में नाकामयाब रहती है, ऐसे मामलों में से समय सीमा की शुरुआत उस दिन में से होती है जब आपको यानी शिकायतकर्ता को या पुलिस के उस अधिकारी को जो उस मामले में जांच पड़ताल कर रहा है, अपराधी के बारे में पता चलता है या दोनों में से जिसे पहले पता चले |


 क्या उपयुक्त समय- सीमा को बढ़ाया जा सकता है? 

यद्यपि दंड प्रक्रिया संहिता कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर के अंतर्गत न्यायालय द्वारा अपराध पर कार्यवाही शुरू करने विचार करने से मुकदमे की सुनवाई करने की कानूनी समय सीमा को स्पष्ट उल्लेख किया गया है  |परंतु इसके बावजूद न्यायालय उचित समझे तो इस समय सीमा को बढ़ा सकता है न्यायालय पर विचार करने और कार्यवाही शुरू करने की समय सीमा को बढ़ा सकता है| और समय सीमा समाप्त होने के बाद भी मामले में कार्रवाई शुरू कर सकता है इस संबंध में आपको विलंब का कारण बताना होगा यदि आप शिकायत करता है तो शिकायत के लिए प्रार्थना पत्र भी देना होगा| जिसमें के कारणों का उल्लेख करते हुए न्यायालय से निवेदन करना होता है इस तरह के प्रार्थना पत्र आवेदनों पर 125 आवश्यक होती है कार्यवाही शुरू कर सकता है न्यायालय को उपयुक्त को कानून द्वारा निर्धारित समय सीमा से बाहर रखा गया है|

शिकायत दाखिल करते समय कितने रुपए के कोर्ट फीस जमा करवानी होती है? 

न्यायालय में शिकायत दाखिल करते समय याचिका पत्र पर कोर्ट फीस के रूप में केवल ₹1 और 25 नए पैसे की कोर्ट फीस स्टैंड चिपकाने होती है |अलग-अलग मूल्य की कोर्ट फीस स्टार पर न्यायालय परिसर में बैठे स्टांप विक्रेताओं या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त दुकानों से खरीदी जा सकती है|
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