मुकदमे की शुरुआत और उसकी अवस्थाएं

यदि आप अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों से सहमत हैं और मुकदमा लड़ना चाहते हैं या न्यायालय आपके द्वारा अपराध स्वीकार करने के कदम को इच्छा विरोध और दबाव में लिया गया निर्णय मानता है तो ऐसी स्थिति में न्यायालय में मुकदमा की कार्यवाही शुरू करने का आदेश देता है सबसे पहले शिकायतकर्ता अभियोजन पक्ष राजा के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को सही साबित करने के लिए अपने गवाहों को पेश करता है न्यायालय गवाहों के बयानों को अपने रिकॉर्ड में दर्ज कर लेता है अभियुक्त के तौर पर आपको भी उन गवाहों से जिरह करने का पूरा अवसर दिया जाता है और मुकदमे की कार्यवाही को क्रॉस एग्जामिनेशन कहां जाता है जिरह के दौरान अभियुक्त या उसका वकील गवाहों से सवाल करता है यदि अभियुक्त को मुकदमे में किसी सहायक की आवश्यकता होती है तो वह अपने लिए वकील कर सकता है
  अभियोजन या शिकायतकर्ता यह सरकार द्वारा पेश किए गए गवाहों की गवाही खत्म होने के बाद आरोप को साबित करने वाले जो भी तथ्य गवाही में आते हैं उन्हें मुलजिम के सामने पढ़ा जाता है और उसे जिनका जवाब देना होता है इसके बाद अभियुक्त को अपने आप को निर्दोष साबित करने तथा अपने खिलाफ लगाए गए आरोप को झूठा साबित करने के लिए अपने बचाव में गवाह पेश करने का अवसर दिया जाता है इसके बाद मामले को अंतिम बहस के लिए रखा जाता है बहस के बाद न्यायाधीश पूरे मामले में विचार करने के बाद अंतिम फैसला सुना देता है शिकायत पर दर्ज वारंट के मामलों की सुनवाई की शुरुआत पुलिस रिपोर्ट के आधार पर शिकायत के आधार पर होती है ऐसे मामलों में सबसे पहले अदालत शिकायतकर्ता की गवाही दर्ज करती है और जब अदालत हुई हो जाए के लिए काफी अच्छे कारण है तो अदालत मुलजिम को पेश होने के लिए आदेश देती है मुलजिम परसों कर जमानत करवाता है एक बार फिर शिकायत दर्ज करवाने के लिए कहा जाता है फिर देखा जाता है कि कोई आरोप तय होता है या नहीं अगर होता है तो आरोप तय करके उपयुक्त तरीके से कार्यवाही की जाती है

अपराध साबित होना( कनविक्शन) 

पूरी बहस सुनने के बाद न्यायाधीश रिकॉर्ड में दर्ज तथ्यों के आधार पर अभियुक्त को दोषी या निर्दोष घोषित कर देता है न्यायाधीश किसी अभियुक्त को केवल तभी अपराधी या दोषी करार देता है जब उसके सामने इस बात के उचित प्रमाण होते हैं कि अभियुक्त ने अपराध किया है और वह दोषी है अभियुक्त को दोषी घोषित करने के बाद न्यायालय इस मामले की सजा पर दोषी के विचार रायबां सुनने के लिए रख लेता है

सजा

सजापुर अपराधी के बाद सुनने के बाद न्यायालय उसे कड़ी चेतावनी देकर या फटकार लगाकर या पक्की जमानत के आधार पर रिहा कर सकता है कई अपराधों के लिए सजा का प्रावधान होता है और उसे इस तरह से रिहा नहीं किया जाता

 चेतावनी

चेतावनी के द्वारा न्यायालय अपराधी लोग कड़ी फटकार लगाकर तथा भविष्य में दोबारा कोई गलती नहीं करने की चेतावनी देकर छोड़ सकता है

पद की जमानत पर छोड़ना अर्थात सुधरने का मौका देना

अपराधी को दोष सिद्ध हो जाने के बावजूद उसे सुधारने का मौका देकर छोड़ा जा सकता है ,आमतौर पर केवल ऐसे अपराधी को पक्की जमानत पर छोड़ा जाता है, जिसकी उम्र 21 साल से कम हो या जिन मामलों में अपराध की सजा 7 साल से कम है |और अपराधी का पहले का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है किसी अपराधी को पक्की जमानत के आधार पर छोड़ने से पहले न्यायालय जिला प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट मंगवा ता है या रिपोर्ट देने के लिए वह अधिकारी अपराधी दोषी से आमने-सामने बैठकर सवाल करता है उसके पड़ोसी और परिवार के लोगों से उसके व्यवहार चरित्र गतिविधियों की जानकारी एकत्रित करता है |  इसके बाद वह अपनी रिपोर्ट न्यायालय को सौंप देता है| जिला अधिकारी की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद न्यायालय अपराधियों की जमानत पर छोड़ सकता है या उसे ऐसा लाभ देने से इनकार भी कर सकता है|

Offence
Justice 

  अपराधी को कितनी समयावधि के लिए जमानत पर छोड़ना है| इसका जिक्र भी फैसले में अवश्य किया जाता है ,जमानत पर रिहाई के समय अपराधी को एक व्यक्तिगत बॉन्ड भरकर किसी  जमानती के जैसा भी न्यायालय का आदेश न्यायाधीश के पास जमा करना पड़ता है |या न्यायालय के सामने एक आश्वासन की जमानत की अवधि के दौरान अपराधी शांति बनाए रखिएगा कोई गलत काम नहीं करेगा| सभी के साथ अच्छा व्यवहार करेगा इसके अलावा बाद का भी आश्वासन है ,कि आपराधिक न्यायालय के निर्देशानुसार हमेशा तारीख और समय पर न्यायालय में पेश होगा, तथा उसे जो भी सजा दी जाएगी वह उसे स्वीकार करेगा |यदि अपराध के नियमों व शर्तों का उल्लंघन करता है तो उसे उस मामले में सुनवाई अपराधी अपराध भी लगा सकता है|

  कुछ मामलों में न्यायाधीश दोषी को जिला प्रोबेशन अधिकारी की निगरानी में जमानत पर रहने के लिए छोड़ सकता है |ऐसे मामलों में अपराधी को समय-समय पर जिला प्रोबेशन अधिकारी के समक्ष पेश होना पड़ता है, ताकि वह उस पर निगरानी रख सके अतः जब भी किसी दोषी वैसे आदेश पर छोड़ा जाता है ,तो उसे स्वयं अपने फायदे के लिए आदेश का उल्लंघन करने से बचना चाहिए था उनकी शर्तों का निष्ठा पूर्वक पालन करना चाहिए ,जिन मामलों में दोषी है और ना ही किसी भी रूप में हो सकती है अपराध की सजा भी हो सकती है|

अपराध साबित हो जाने के बाद अभियुक्त की जमानत

न्यायालय में अपराध सिद्ध हो जाने के बाद यदि अभियुक्त न्यायालय से या प्रार्थना करता है, कि वह उस आदेश के खिलाफ अपील दाखिल करेगा तो न्यायालय से जमानत पर रिहा कर सकता है |परंतु या जमानत के ऐसे मामलों में दी जाती है जहां अभियुक्त को 3 साल से कम की सजा सुनाई गई हो और अपराध साबित होने से पहले उस मुकदमे में जमानत पर बाहर हो इसके अलावा अपराधी ने कोई जमानती अपराध किया है |और वह पहले से जमानत पर है तो सजा सुनाने वाले न्यायालय से जमानत दे देता है ऐसे सभी मामलों में सजा पर अपील दायर करने की समयसीमा अपील का फैसला आने तक रोक लग जाती है |अपराध साबित होने के बाद जमानत पर रिहाई का आदेश भी दिया जा सकता है|

अपील और पुनर्विचार याचिका

न्यायालय अपराध साबित होने के बाद अभियुक्त के खिलाफ सजा का आदेश सुना देता है ,पर यदि अभियुक्त उस आदेश से सहमत नहीं है तो उसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील दाखिल कर सकता है| उदाहरण के तौर पर यदि सजा का फैसला मेट्रोपॉलिटन या जुडिशल मजिस्ट्रेट द्वारा सुनाया गया है तो ,उसके खिलाफ सेशन कोर्ट में अपील दाखिल की जा सकती है| यदि मुलजिम निचली अदालत में अपनी मर्जी से अपना अपराध स्वीकार कर लेता है ,तो उसे मामले में अपील केवल तभी की सजा सकती है ,जब सजा  को कानूनी तौर पर अनुचित कहा जाए यानी कि वह उस आदेश के खिलाफ अपील दायर कर सकता है ,कि उसको दी गई सजा की अवधि बहुत ज्यादा है उसे जेल भेजने की जमानत पर छोड़ देना चाहिए|
 यदि किसी मामले में दोषी को सत्र न्यायालय द्वारा सजा सुनाई गई है ,तो उसकी अपील उच्च न्यायालय में की जाती है
कुछ आदेशों को पुनर्विचार याचिका के माध्यम से भी चुनौती दी जा सकती है ,पुनर्विचार याचिका अपील से अलग होती है ऐसी आदेश को चुनौती देने के लिए दाखिल की जाती है जिसके द्वारा मुलजिम या किसी पक्ष के महत्वपूर्ण अधिकार का हनन होता है ,किसी आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई पुनर्विचार याचिका सुनवाई करने वाले न्यायालय से उच्च न्यायालय में दाखिल की जाती है उदाहरण के तौर पर यदि कोई विवादास्पद आदेश मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के न्यायालय द्वारा सुनाया गया है, तो उसके पुनर्विचार याचिका उच्च न्यायालय में दाखिल की जाती है |    इसके आदेश को चुनौती देने के लिए पुनर्विचार याचिका हमेशा उच्च न्यायालय में दाखिल करनी होती है पुनर्विचार याचिका दाखिल करने के लिए 90 दिन का समय सीमा तय की गई है| 
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